# अनुवर्ती
प्रकृति ने इतना वरदान दिया हम सबको
उसके अनुवर्ती बन जीवन-यापन कर लें
और सीख लें कैसे जीना उसके संग है
जीवन में इस इंद्रधनुष के कितने रंग हैं !
जीवन की टेढ़ी-मेढ़ी सी ये पगडंडी
माना ,तम में साफ़ दिखाई न देती हैं
किन्तु सूर्य की रोशन किरणें दिखलातीं जो
जाने क्यों ये नज़र नहीं आतीं हैं हमको ?
क्यों अँधे बन -बन करके हम सब जीते हैं ?
पात्र गरल का स्वयं उठाकर ही पीते हैं
गांधारी बन जीवन भर रोते रहते हैं
विश्वासों को ठोकर में ले हम रीते हैं !
समय बड़ा है कठिन चलो कुछ वादे कर लें
प्रकृति के आशीष सभी हम मन में भर लें !
वह तो माँ है जो पीड़ित ही रही सदा से
किन्तु हमें पालन करने हैं नियम अब से
अब तो सोचें ,समझें उसका ये दुलार हम
क्षमा माँग लें ,कर लें फिर अपना उद्धार हम !!
डॉ .प्रणव भारती