#उष्ण
उष्ण मन है,उष्ण है तन
पर हरारत भावना की
जानते हैं एक हैं सब
पर कहाँ संवेदना है
और जो भी दिख रहा है
वो कहाँ आराधना है?
साँस में जाले पड़े हैं
प्राण में छिप बैठी सिसकी
क्या कहीं कुछ पारदर्शी
सब यहाँ क्यों खोखला है?
मान और अपमान सब है
पर यहाँ सम्मान कब है
दर्द जो सोखे सभी का
ऐसा ब्लाॅटिंग ही कहाँ है?
कब ?किसे?कैसे बताऊँ
सबकी ये ही त्रासदी है
समय की जंजीर बाँधे
परीक्षा यह घड़ी है।
डॉ.प्रणवभारती