Hindi Quote in Poem by DrPranava Bharti

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#उत्साही   
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आज मैं कुछ गुनगुनाना चाहती हूँ 
सुप्त  श्वाँसों  को खिलाना  चाहती हूँ 
श्वाँस  तो लेतीं परीक्षा हैं निरंतर 
हाशिये पर थम भी जाती हैं ये जाकर 
मोल  कुछ न है किसी की भावना का 
होश में रहती हमारी कल्पना का 
आज मैं सब -कुछ सुनाना  चाहती हूँ
पीर को सबसे  छिपाना चाहती हूँ
दीखते हैं सब ही घायल से परिंदे 
कैसे फँस  बैठे  सभी जंजाल में ये 
एक वायु के प्रबल झौंके सरीखे 
कैसे उखड़े हैं किसी भी डाल से ये 
आज उनको फिर बसाना चाहती हूँ  
उनके  पर  फिर से लगाना चाहती हूँ 
प्राण भरकर मुस्कुराना चाहती हूँ 
आज न संतोष की बातें करो तुम 
गीत की न रीत की बातें करो तुम 
आज जीवन के सिरहाने श्वाँस भरकर
और उत्साही सुरों के साथ मिलकर 
आज फिर से खिलखिलाना चाहती हूँ 
धरती और आकाश  की बातें करो तुम
अपनी जड़ से जुड़ सको ऐसा करो तुम 
आज मन के द्वार खोलो ,बस दृगों से आज बोलो 
चार दिन की ,चार क्षण की आस लेकर 
आज मैं सबको हँसाना चाहती  हूँ
आज मन आनंद पाना चाह्ती हूँ ॥               

डॉ. प्रणव भारती 

Hindi Poem by DrPranava Bharti : 111484685
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