बिना तेज़ के पुरुष की,अवशि अवज्ञा होय,
आगि बुझे ज्यों राख की,आप छुवै सब कोई।
अथार्त
तुलसीदास जी कहते हें,जीस प्रकार ठंडी हो चुकी राख को कोई भी छुने लगता हे,
वैसे ही तेजहिन व्यक्ति की बातें और सलाह का कोई मोल नहीं होता हे,
क्योंकि जब तेजहिन व्यक्ति का ही कोई महत्व नहीं तो फ़िर भला उहकी आज्ञा का पालन कौन करेंगा।