संघर्ष .....अभी जो बाकि है.....
मदहोश समां , घनघोर बसंत
सब खत्म हो रहा , झर झर के
है आँख भरी , पर पैर सुन्न
फिर भी चलता मै डर डर के
सब दूर खड़े , कोई पास नहीं
सब अपने है , कोई खास नहीं
सब कहते है मैं बीत गया
शायद , अब मुझमे वो बात नहीं
मैं लड़ूँ मरुँ , करूँ जोर- झपट
खुदसे करता कोई घोर कपट
क्या कहदूँ की मैं हार गया
या करदूँ सबको झटक पटक
मनमे गुस्सा है बहुत भरा
अफ़सोस तो उससे ज्यादा है
रोज मैं मरता , लड़ लड़ के
एक दिन जीने का वादा है
सब साथ में हो जो साथ नहीं
सब खास हो जो अब खास नहीं
ये सब चलती हुई बाजी है
ये कोई पूरी ताश नहीं
एक दिन पूरा हो जायेगा
संघर्ष ! अभी जो बाकि है
उस दिन दुनिया भी बोलेगी
ये आग की लगती झांकी है