एक अजीब सी पीडा, अजीब से अकेलेपन से होकर उपन्यास गुज़रता है। ठीक इस वक्त उपन्यास जिस छोर पर खड़ा है वहां अगर एक शब्द भी फेंको तो वो इतनी देर तक गूजता है कि लगता है जैसे, जल्द ही अगर उसे दूसरे शब्द का सहारा नही दिया गया, तो मेरे कान फट जायेंगे..ये अघिक्तर उन शब्दों के साथ होता है जो झूठे होते हैं, ज़बरदस्ति कहीं फसाए जाते है.. और जिन्हे मैंने अपनी पूरी ईमानदारी या पूरी सच्चाई के साथ नहीं लिखा होता है...। वक़्त उपन्यास को लिखने में उतना नहीं लग रहा है जितना वक़्त इन झूठे शब्दों को मिटाने.. अजीब बात है..:-). निर्मल वर्मा 😇🌸