उन्नति चाहे जितनी कर लें , हर बात अधूरी रहती है
यदि अंतस में ना दीप जलें , जन - जन में दूरी रहती है
उन्नति में है यदि व्यापकता , दायरा बड़ा यदि होता है
आगे बढ़ते सब लोग जहां , देश आगे खुद बढ़ जाता है
हम बढ़ें मगर रोकें न राह , किसी और की जो बढ़ना चाहे
हम चढ़ें हिमालय पर बेशक़ , रोकें न राह जो चढ़ना चाहे
समान मिले सबको अवसर , पुरुषार्थ अपना दिखलाने को
शिकवा और शिकायत हो न कभी , कोई बात न हो झुठलाने को
समता का भाव हो जीवन में , परहित के मर्म को समझें हम
सबका उत्कर्ष ही उन्नति है , इस उन्नति के धर्म को समझें हम
#उन्नति