ज़िंदगी
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गीत सी कैसी मधुर है ज़िंदगी ,
प्रीत सी कैसी सुकोमल हर घड़ी ।
ज़िंदगी बस एक पल का नाम है ,
जूझता जिससे ये जग बिन दाम है ।
दाम, बस मुस्कान ही तो पल की है ,
स्वप्न सी कैसे छले है ज़िंदगी ।
भावना का, प्रीत का संबल यही,
अर्चना की जीत का प्रतिफल यही ।
जीत तो बस एक घड़ी है ज़िंदगी ,
द्वार पर कैसी मढ़ी है ज़िंदगी ।
धड़कनों का प्राण ,जो है ज़िंदगी,
प्रीत और मधुमास जो है ज़िंदगी ।
ज़िंदगी के बिन सभी माटी यहाँ ,
आईने कैसी जड़ी है ज़िंदगी ।
कामना भी है अगर है ज़िंदगी ,
भावना का मोल जो है ज़िंदगी ।
ज़िंदगी जब तोड़ती धागा यहाँ ,
आंगने कैसी पड़े है ज़िंदगी ॥
डॉ .प्रणव भारती