पितृ दिवस पर " पिता को समर्पित मेरी रचना आज आप सभी के लिए।
बस एक बार
सामने आ जाइये
कुछ अनसुलझे सवाल
जवाब चाहिए मुझे
एक झलक नही मिली
जब गए दूर मुझसे
किस बात की ये
सजा मिली मुझे
लाड़ली थी बहुत
ताक़त थी तुम्हारी
क्या जरा भी उस वक़्त
मेरी याद नही आई
मुड़कर भी न देखा एक बार
क्या सोच में भी न आई
सात फेरों के बाद मैं
क्या इतनी परायी हो गयी
हिम्मत थी मेरी आपसे
मायका गुलजार था मेरा
आपके न रहने से
छूटा हर अपना मेरा
हर सूरत में हर पल
आपको तलाशती रहती हूँ
खोज अंतहीन है मेरी
फिर भी ढूंढती रहती हूँ
कह देते यमराज से
मेरी लाड़ली अकेली हो जायेगी
मेरे बिना उसके जीवन से
रौशनी की किरण खो जायेगी
साथी जो दिया आपने
बखूबी साथ निभाता है
हर शैतानी पर मेरी
मुस्कुराता रहता है
मेरा आँचल बहुत बड़ा है पापा
आज भी आपकी जगह खाली है
क्यों एक ख़ुशी मुझे देकर
दूसरी आपने छीनी है
दो इन सवालों का जवाब मुझे
आपकी नौटंकी सर उठाये खड़ी है
एक दिन की ये बात नहीं
हर साँस,हर पल आपसे जुडी है
विनय....दिल से बस यूँ ही
.....पापा की याद सँजोती हुई