मेरा गाँव
गाँव का गलियारा
कच्चे रास्ते ,कच्चे मकान
वहीं एक कल्लू की दुकान
चार आने की बिस्कुट टॉफी में
पा जाएं सारा जहांन
वही एक चक्की पास में
पिसता वहाँ गेहूँ ,बाजरा ,चना
आटे से सना रघ्घू
घूमता फिरता बाबा बना ,
गलियारे से निकलते ही
परधान जी की हवेली
वहाँ सुनाता रामवतार-
-चुटीले किस्से कहानी
रहती हमेशा मजलिस जमी ,
हवेली के सामने
सब्ज़ी और फलों की बगिया
वहीं छवाई दुलारे किसान की मड़ैया
दुलारे अपने नाम की तरह प्यारे हैं ,
मेहनत कर ,ठंडा पानी पी ,रोटी खाते
देख पराई चूपड़ी ,नहीं जी को ललचाते ,
बगिया के ही पास बना एक मंदिर
राधा कृष्ण ,सीता राम संग -
- बारह ज्योतिर्लिंग भी स्थापित
मंदिर का द्वार है सबके लिए खुला
वहाँ न कोई छोटा न कोई बड़ा ,
हवेली के सामने से गुज़रती बैलगाड़ी
संग-संग चलें मंगनु और बनवारी ,
घूंघट में छुपी बहुरिया मुस्काए
पग्गु बेचारा तरस तरस जाए,
रात चाँदनी ,सुबह सुनहली
ढोल थाप संग गाये कनेली ,
मिलजुल सब त्योहार मनाएं
कहे सुनाएं ,बतकही लगाएं ,
सब मिल बैठे प्यार की छाँव
ऐसा प्यारा मेरा गाँव……..
पर अब बढ़ते शहर के पाँव
सिमटता जाता मेरा गाँव
कटते जाते खेत खलिहान
थका हारा रहता किसान ,
किसान की खत्ती भरना चाहे
मेहनत उसकी व्यर्थ न जाए ,
हर गाँव, किसान जो हो खुशहाल
ऊँचा हो फिर देश का भाल
डॉ जया आनंद