क्या प्रेम किसी व्यक्ति को इस प्रकार विवश कर देता है कि वह व्यक्ति अवसाद के उस स्तर पर पहुंच जाता है कि उसे अपने जीवन के मूल उद्देश्यों का भी ख़्याल नहीं रह पाता? हमारे जीवन का उद्देश्य तो इस रूहानी दुनिया को पाना है,फिर मनुष्य माया के चक्करों में फंस कर अपने उद्देश्यों से भटककर एक ऐसे पथ पर निकल पड़ता है,जहाँ उसके ह्रदय के भीतर के कोलाहल को सुन पाना कठिन हो जाता है। मनुष्य का मन एक शांत समुंदर की तरह होता है,जिसमें किसी भी बाहरी व्यक्ति का प्रवेश तब तक वर्जित है जब तक वह व्यक्ति बिना हलचल किये उसके मन मस्तिष्क तक पहुँचने का प्रयास नहीं करता।