आजकल मैं
बस सोचों में ही
खोया खोया सा रहता हूं
जागते हुए भी
सोया सोया सा रहता हूं
एक काम शुरू करता हूं
फ़िर बीच में ही उसे छोड़
दूजा पकड़ लेता हूं
काम कोई रास नहीं आता
तनहा तनहा सा रहता हूं
शिकायत है ज़माने से कि
कोई दोस्त पास नहीं आता
बहुत सोचता हूं और
दिमाग के तारों को
खूब नोचता हूं कि
क्या सोचूं, क्या करूं ऐसा अब
कि संभल जाए, बदल जाए सब
इसी उधेड़बुन में हो जाती है
सुबहों से शामें
और
इन सोचों के चक्रव्यूह के भीतर
घुस तो जाता हूं
पर नहीं मिलता
बाहर आने का रास्ता कोई
:- भुवन पांडे
#निद्रालु