एक नशा सा होता है
एक मज़्ज़ा सा होता है
जब में उनको देखता हूं ,
वो मुझको देखती है।
जो में उसे देखता हूं ,
लहरे सी उठति है।
जो मैं उसकी और भड़ता हूं,
चिंगारी सी जुटती है।
समये थम सा जाता है,
जब सामने वो होती है।
जब सामने वो होती है ,
मन में उसका पूरा आकार होता है,
पूरा शहर अन्धेकार ,
ओर वो प्रकाश होता है,
हा सब अलग होता है ,
जब नशा होता है ।
जब वो करीब होती है ,
सब अलग होता है ।
ओर उसका एक नशा होता है ।
गला सुक जाता है ।
और हिरदय तेज होता है।
अग्नि सी जल जाती है ।
उस आग को देख कर,
मन करता है
जल जाऊ ,
बस हाथ पकड़ कर ।
हा नयन भाटक जाते है ,
जब उनको हमारा अभास होता है ,
क्या उनका दिल भी धड़कता है?
जब हमारा अहेसास होता है ?
अरे
रूह निकल गयी ,
यह सरीर त्याग कर,
और जला गयी वो ,
दूर से ताक कर ।
हा हर बार अलग होता है ।
हा हर बार गलत होता है ।
जब दूर से रह जाता हूं ।
उसे निहार कर।