काटों के बीच मुस्कुराते गुलाब सा हूँ मैं, मुक़द्दस चिज़ो पर लगे नक़ाब सा हूँ मैं...
दिल से पढ़ोगे तो समझ जाओगे तुम मुझे, बैशक एक मुश्किल किताब सा हूँ मैं...
सवाल बेवजह उठे है मेरे किरदार पर, बुनियाद का आसान जवाब सा हूँ
वक्त देखकर ढलती रात ना समझना मुझे, सूरज से पहले आनेवाले आफ़ताब सा हूँ मैं...
" अर्जुन" के अंदर भी बहोत से तुफान पलते है, राख के नीचे की दबी एक आग सा हूँ मैं..!