#एक_शायर_की_कहानी
(लघुकथा)
जाड़ों की सर्द सुबह जब ज़माना रजाई में भी कँपकँपा रहा था । तब 10-12 साल का लड़का आंख मलते हुए अनमने ढंग से उठकर बैठ जाता है । घड़ी पर नज़र दौड़ाते ही बाथरूम की तरफ दौड़ लगाता है । माँ को सर्दी में जल्दी उठने की तकलीफ कौन दे इसलिए खुद ही अपनी चाय बनाकर पीकर कप प्लेट धोकर अपनी साइकिल उठाकर अपने काम पर चल दिया । घर की जिम्मेदारी को समय से पहले ही जिम्मेदार होकर उठाना हर किसी के बस का नही । दुनिया को उसी की खबरों से रूबरू कराने हर दरवाज़े अखबारों की पुंगीया फँसाता हुआ वह शब्दों के जाल बुनता रहता ।
इतने सालों बाद आज अपने चारों तरफ के माहौल को अपनी भावनाओं में कागज़ पर उकेरते हुए एक प्रख्यात कवि शायर तक का सफर उसने यूँ ही तय नही किया था । उमर का वो हिस्सा जिसमे बच्चे खेलते कूदते हैं मौज मस्ती करते हैं उसने जिंदगी के अनुभव बटोरने में लगाया था । अब उन्हीं अनुभवों को शब्दों में ढालते हुए उन्हीं में अपनी पहचान को भी ढाल दिया ।
मन्दिर की दहलीज पर बैठे हुए वह जीवन के उसी बीते हुए हिस्से को खंगाल रहा था । जब कुछ नही था तब सब थे अब सब कुछ है पर एक तन्हाई भी थी । बाहर का शोर सबको सुनाई देता है । पर मन के भीतर का शोर सिर्फ वही सुन सकता था । एक ऐसा शोर जो बड़ी खामोशी से अनवरत उसके दिल मे मचा हुआ था ।
अतुल कुमार शर्मा "कुमार"