सुबह का भूला
राजकुमार अपनी पत्नी दो बेटों एवं अपने माता पिता के साथ अपने दो कमरों के मकान में बड़ी कठिनाई से रहता था। उसका बड़ा बेटा बारह बरस का था जो कुछ समझदार हो गया था, छोटा अभी सात बरस का ही था।
राजकुमार की पत्नी बहुत महत्वाकांक्षी थी। वह अपना एकाधिकार चाहती थी। वह प्रायः अपने पति से कहा करती थी कि या तो किसी बड़े घर की व्यवस्था करो या फिर माता-पिता के अलग रहने का प्रबंध कर लो ताकि सारी समस्याओं का हल निकल आए। उसकी हमेशा की इस बात से परेशान होकर एक दिन उसने अपने माता पिता से इस कठिनाई के विषय में चर्चा की। बेटे की परेशानी को देखते हुये उन्होंने सहर्ष ही वृद्धाश्रम में रहने की सहमति व्यक्त करते हुये कुछ दिन पश्चात् वहाँ चले गये।
राजकुमार के दोनों बेटे दादा दादी के चले जाने से बहुत उदास हो गये क्योंकि वे उन्हें बहुत प्यार करते थे। अवकाश के दिन वह उन्हें अपने दादा दादी से मिलवाने ले गया। वे जाकर उनसे लिपट गये। फिर उन्होंने अपने दादा-दादी से पूछा कि वे यहाँ रहने क्यों चले आए। दादा-दादी से कोई उत्तर देते नहीं बना। उन्होंने कहा कि यह तुम अपने पापा से ही पूछ लेना। घर आकर दोनों बेटे अपने माता-पिता के पीछे पड़ गये तो पिता ने उन्हें समझाया कि घर छोटा होने के कारण उन्हें ऐसा करना पड़ा।
रात को जब सब लोग सो रहे थे तब भी उसके बड़े बेटे को नींद नहीं आ रही थी। वह सोचते-सोचते रोने लगा। उसकी सिसकियां सुनकर उसकी माँ की नींद खुल गई। उसने बेटे से रोने का कारण पूछा पर उसने कोई उत्तर नहीं दिया, तब माँ ने उसके पिता को जगाया। पिता ने भी अपने बेटे से जब पूछा तो वह बोला- मैं दो कारणों से रो रहा हूँ। मुझे बहुत दुख हो रहा है। आप तो अपने पिता जी के अकेले पुत्र हैं फिर भी आपको उन्हें घर छोटा होने के कारण वृद्धाश्रम भेजना पड़ा। हम तो दो भाई हैं हमें तो आपको और भी जल्दी वृद्धाश्रम भेजना पडे़गा और फिर जब मेरी संतान होगी तो वह मुझे भी इसी प्रकार वृद्धाश्रम भेज देगी। न तो मैं आपको वृद्धाश्रम भेजना चाहता हूँ और न ही मैं स्वयं वृद्धाश्रम जाना चाहता हूँ। यही सोच-सोचकर मुझे रूलाई आ रही है।
उसकी बात सुनकर उनकी आँखें खुल गईं और वे अपने माता-पिता से क्षमा माँगते हुये उन्हें वापस अपने घर ले आए। हमारे रहने की जगह कितनी भी छोटी हो पर हमें अपने दिल को बड़ा रखना चाहिए।