. नकलची
दुबई के एक रेस्टारेंट में, मैं अपने मित्र रमेश के साथ बैठा हुआ अपने छात्र जीवन की भूली बिसरी यादों के बारे में बातें कर रहे थे। उसे वह दिन अच्छे से याद था जब परीक्षा में अधिकांश छात्र नकल कर रहे थे और वह नकल ना करने के सिद्धांत पर अडिग था। उसका सोचना था कि नकल करके पास होने से अच्छा तो परीक्षा में अनुत्तीर्ण होना है और दुर्भाग्यवश ऐसा ही हुआ वह वार्षिक परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो गया। उसने इसे चुनौती के रूप में स्वीकार कर मन लगाकर अध्ययन करना प्रारंभ किया। इसके बाद वह आगे की कक्षाओं में हमेशा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होता गया। अपनी पढ़ाई समाप्त करने के बाद वह दुबई आ गया और अपनी ईमानदारी और कठोर परिश्रम से आज वहाँ की एक विख्यात कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत है।
वह आज भी कहता है यदि मैं उस दिन नकल करके पास हो जाता तो जीवन में इतनी तरक्की नही कर पाता क्योंकि वह नकल करना मेरी आदत बनकर स्वभाव में आ जाती और मेरा बौद्धिक विकास एवं नैतिक चरित्र अवरूद्ध हो जाता। उसे आज भी अपने पिंटू सर की बातें याद है। वे कहा करते थे कि नकल करने में भी अक्ल की जरूरत होती है। एक बार परीक्षा में पंडित जवाहरलाल नेहरू की जीवनी पर प्रश्न आया तो एक नकलची ने उनकी जगह पर महात्मा गांधी की जीवनी लिख दी। कोई भी नकल क्यों करता है क्योंकि पढ़ाई करने में उसका मन नही लगता है और परीक्षा में पास होना चाहता है नकल करके पास हुआ जा सकता है परंतु आज तक कोई भी नकल करके प्रथम श्रेणी प्राप्त नही कर सका है। ऐसा व्यक्तित्व जीवन के वास्तविक धरातल पर आने वाली कठिनाईयों से जूझने में असफल रहता है। इसलिये हमेशा ध्यान रखना कि जीवन में नकल करके पास होने से अच्छा तो परीक्षा में अनुत्तीर्ण होकर पुनः प्रयास करना है। यही जीवन की सफलता का मूलमंत्र है। जीवटता एवं जिजिविशा के साथ संघर्ष करें, आगे बढ़े और अपने लक्ष्य को प्राप्त करें।