गीता से उड़ता गीत..
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ओ कृष्णा..!!
जीवन के कुरुक्षेत्र में
आज भी अपनों से ही हो रहा युद्ध
पराया तो कोई नहीं
भागने का मन है, अर्जुन की तरह
रणक्षेत्र में, क्यूँ अब कोई कृष्ण नहीं..??
अहंकार है बना सारथी
रथ शरीर का लिए भागते
बेकाबू हैं इन्द्रियों के घोड़े
फ़ौज खड़ी है अपनों की
किसको मारे,किसको छोड़ें
ओ कृष्णा...!!
इस महान युद्ध की घड़ी में
तेरे अनूठे शब्दों की ज्योति से
जल जाए, हमारा भी बुझा चराग
दुर्योधन की तरह हमने भी
अनजाने ही
फ़ौज-फांटा चुन लिया
अर्जुन ने तुझको ही पाया
सेहरा यूं जीत का पहन लिया
गीता तो है सदैव जन्म लेने को तत्पर
आओ,
हम उसको थोड़ा गर्भ दें
तो
अर्जुन को जैसे मिली है गीता
शायद,हमको भी मिल जाए...!!
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करुनेश कंचन