दर्द जब हद से बढ़ जाता है,
चीखना चाहते है..
चिल्लाना चाहते है...
मन में जमी धूल एक पल में निकालना चाहते है...
चाहते हैं कह दें सब हाल-ए-दिल,
पर कुछ कह नहीं पाते..
होंठ काँप उठते हैं कुछ कहने से पहले..
आंखे छलछला जाती हैं कुछ कहने से पहले..
और बहा देती हैं आसुंओ में सब,
वो दर्द जो दिल सह नहीं पाता..
जो जुबां कभी कह नहीं पाती..
पर बात तो ये भी है की
इन आसुंओ की कीमत कहां जानते हैं
दर्द देने वाले..
दिलों की की बात नहीं जानते सब दिलों वाले..
दिलों की बात नही जानते दिलों में रहने वाले..