मेरे मन के सरोवर में , है कंकर मारता कोई
हुई हलचल तरंगों की , तब होता है मन बागी
लीक से अलग चलने पर , रोकती राह जब दुनिया
अलग पहचान हो अपनी , तब होता है मन बागी
पुरानी रीतियां जब भी , घाव बनकर के रिसती हैं
चेतन हो समाज अपना , तब होता है मन बागी
सामाजिक ताने - बाने पर , चोट करता है जब कोई
नहीं बिखरे सामाजिक मूल्य , तब होता है मन बागी
देश का मान तब बढ़ता , हो जितना मान नारी का
है इनका मान करता नष्ट , तब होता है मन बागी
प्रकृति की प्रकृत है आज़ाद , नहीं बंधन है जीवन में
बनें कोई राह का पत्थर , तब होता है मन बागी
मिला है हक़ सभी को ज़िन्दगी , भरपूर जीने का
हटाए पथ से जीवन को , तब होता है मन बागी
खयाल आए किसी को भी , हमें परतंत्र करने का
मिला दूं राख में उसको , तब होता है मन बागी
जियो तुम भी , रहें हम भी , ये दुनिया चार दिन की है
हंसो तुम भी , हंसे हम भी , ये दुनिया चार दिन की है
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#बाग़ी