हवा उग्र हो
तूफ़ान बन गई
नदी उग्र हो
सैलाब बन गई
पर्वत उग्र हो
ज्वालामुखी हो गया
ज़मीं उग्र हो
भूकम्प हो गई
आकाश उग्र हो
गरज बरस गया
जंगल उग्र हो
दावानिल हो गया
वहीं
मनुज उग्र हो
दानव हो गया
और खा गया -
हवा, नदी, पर्वत
ज़मीं, आकाश और जंगल
सभी को
:- भुवन पांडे
#उग्र