बहुत सा सजावटी सामान
इकठ्ठा कर मैंने
सजाया पूरा घर
बनाया उसका कोना कोना
सुंदर मनभावन
रोज़ ही उन्हें मन भर निहारता
उन्हें सहेज कर रखता
ध्यान रखता कि
कोई भी ना छेड़े, छूए उन्हें
धीरे धीरे वो सारा सामान
बस गया मेरे ज़हन में
एक और घर बन गया मेरे भीतर
मेरे मन का कोना कोना
भर गया उस सारे सामान से
और अब ...
कोई जगह नहीं बची है
किसी अन्य भावना की मन में
जुड़ते जोड़ते इतना सामान
छूटते टूटते गए कितने ही
भाव कोमल मन के
और अब
बन गया है ये मन
खोखला शुष्क सजावटी
बेजान रूखा बनावटी
:- भुवन पांडे
#सजावटी