उसूल हमारे फूल तुम्हारे
एक था दिखावटी
एक था सजावटी
लो हो गया हिसाब बराबर
जैसे तुमने हमारे उसूलों को मान दिया
वैसे ही मैंने तुम्हारा सम्मान स्वीकार किया
मेरी भी रही तुम्हारी भी रही
यही तो आज का चलन है
अपनें मुंह मियां - मिठ्ठू बनते हैं सब
दुनिया जाए भाड़ में
इस सोच की आड़ में
अब हमारी दुनिया हमी तक सीमित है
इसीलिए हमारे लिए हर असीमित चीजें
सीमित है
हमारी सोच, हमारी दुनिया
मेंढक की तरह हो गई है
आंख होते हुए भी अंधे हैं
दिल होते हुए भी बेदिल हैं
इंसान होते हुए भी पत्थर हैं
शायद कोई आएगा जो दुनिया की
फानी सजावट को उतार फेंकेगा
और सच्चाई से हम सबको अवगत कराएगा
ऐसी हम सबकी उम्मीद है
उम्मीद पर ही दुनिया कायम है
#सजावटी