डाकखाने का डाक बाबू
जब अपनी साइकिल पर
चिट्ठियों का थैला लेकर
गाँव की गलियों में आता
तो घर की चौखट पर
अधखुले दरवाजे के पीछे
घूँघट की ओट से दो आँखे
डाक बाबू की राह तकती
आज तो उसके नाम की भी
जरूर कोई डाक होगी
पुकारेगा डाक बाबू उसका नाम
बलम परदेसी ने चिट्ठी
जरूर भेजी होगी
उम्मीद का चिराग
बुझ जाता हैं
जब डाक बाबू
दरवाजा पार करके
दूसरी चौखट पर
पहुँच जाता हैं
खटाक से वो अधखुला
दरवाजा बंद हो जाता हैं
कल फिर चौखट पर
घूँघट के पीछे छुपी
दो जोड़ी आँखे
राह तकेंगी डाक बाबू की
कल फिर इन्तजार होगा
बरस से तरसाने वाली
एक निगोड़ी चिट्ठी का