याद
नहीं आती हो तुम लेकिन तुम्हारी याद आती हैं
हंसा देती थी तुम मिलकर, ये मिलकर के रुलाती है
अजी तुममें तुम्हारी याद में बस फर्क है इतना
कि तुमसे मिलती थी राहत ये बेचैनी बढ़ाती है
अजी नग्मे बनाना तो मेरी ताकत के बाहर था
मगर बेचैन आंहे गम के ये नग्मे बनाती हैं
नहीं गाता हूं खुद से में ये नग्मे ए गमे साथी
हिमाकत ये ज़ुबां की है ओ बेचैनी गवाती हैं
नहीं आती हो तुम लेकिन तुम्हारी याद आती हैं
हंसा देती थी तुम मिलकर, ये मिलकर के रुलाती है
- प्रज्ञात अग्रवाल