आज की प्रतियोगिता ****
आज की कविता ***
#शुरुआत .विषय ***
जिदंगी से हम ,हार चुके थे ।
आशा हमारी ,धुंधली हो चुकी थी ।।
जीवन नैया ,मंझधार में फसी थी ।
विरानी के साये ,में हम जी रहे थे ।।
दिल की उमंगे ,साथ छोड़ चूकी थी ।
नदी के किनारें ,खड़े सोच रहे थे ।।
किसी ने पानी ,में पत्थर फैका था ।
उसकी आवाज से ,जाग गये थे ।।
किसी ने कहा ,नदी कभी रुकती नही है ।
अविरल सदा ,बहती रहती है ।।
बाधाओं को चीरती हुई ,सदा आगे बढ़ती है ।
बस हम भी जीवन की ,नयी शुरुवात करेगें ।।
हिमंत हम कभी ,नहीं हारेगें ।
कहता बृजेश फिर नयी ,जिदंगी की शुरुवात करेगें ।।
बृजमोहन रणा (बृजेश ) ,कश्यप ,कवि ,अमदाबाद ,गुजरात ।