नौटंकी
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नौटंकी शब्द जब भी पढ़ने को मिला बहुत सारी पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं। इस शब्द से मेरा गहरा नाता रहा हैं| बचपन सें लेकर 2० साल तक इस शब्द ने मेरी और मेरे पापा की बहुत नोंक-झोंक करवाई हैा
मैं बचपन से बहुत तंदरूस्त रही हूँ सच कहूं तो मोटी थी। खाने की खूब शौकीन रही हूँ। पापा बार बार नौटंकी कह कर चिढाते थे। बडा क्रोध आता था।क्या है, क्यों बार बार नौटंकी कहते हो? क्या मैं इतना खाती हूँ जिसमे 9 टंकियाँ भर जाये। मुझे उस वक़्त नौटंकी का यही अर्थ मालूम था। फिर आरम्भ होता पलटवार।
आप दस टंके,
आप बारह टंके
और कभी कभी तो बीस और पचास टंका तक गिनती पहुंचा देती।
पापा हर बार बस हंस कर रह जाते थे। कुछ नहीं कहते और मेरा पारा और चढ़ जाता।
फिर शादी के बाद ससुराल आई तो पतिदेव ने पूछा कि तुम पापा के नौटंकी कहने से क्यों चिढ़ती हो। तुम्हे पता भी है कि नौटंकी कौन थी?
मैंने कहा कि नही आप बताइये।
इन्होंने मुझे एक राजकुमारी की कहानी सुनाई जिसका नाम नौटंकी था, जो परियो से भी ज्यादा खूबसूरत थी और जिसे उसके पिता बहुत प्यार करते थे।
मेरी आँखे भर आई।
जब वापिस मायके आई तो फिर से पापा ने कहा कि आ गई मेरी नौटंकी। मुझे क्रोध नही आया बस चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान खिल उठी।
पापा समझ चुके थे कि मुझे नौटंकी की कहानी के बारे में पता चल चुका है। सीधा मेरे पतिदेव से कहने लगे अरे कबूतर ये तूने क्या किया? अब ये मुझसे कभी नहीं लड़ेंगी।
इस बात की 25 साल गुजर चुके हैं। शादी के 6 महीने बाद प्रभु मुझसे नाराज हुए और पापा को अपने पास बुला लिया। उस दिन के बाद किसी ने मुझे नौटंकी कहकर नहीं पुकारा। शायद किसी और के मुँह से मैं यह सम्बोधन सुन भी नहीं पाऊं।
आज बुला रही हूँ आपको पापा। सुन रहे हैं ना आप।आ जाइये फिर से मुझे नौटंकी कहने के लिए। मेरा वादा है आपसे मैं फिर से वैसे ही झगड़ा करुँगी। भूल जाउंगी जो कहानी मुझे हरजीत जी ने सुनाई थी। अब मैं उतनी मोटी नहीं हूँ लेकिन फिर से मोटी हो जाउंगी , बस एक बार आकर नौटंकी कह दीजिये।
काश कोई मेरे गुजरे वो पल वापिस लादे मुझे|
विनय...दिल से बस यूं ही