जरूरतें कब किसकी पूरी हुई हैं
मिलकर भी लगे अधूरी ही रही हैं
मन की चाहतों का समंदर है अथाह
पाकर कुछ बूंदें कहां भरती है चाह
ज़रूरतमंद कौन है यह कैसे समझें
नहीं वह जो लिए खाली लोटा घूमें
मुसीबत में फंसा जो नहीं मांगता कुछ
वही हकदार है पाने का सब सचमुच
:- भुवन पांडे
#ज़रूरतमंद