पता नहीं, मेरा यह अचानक वाला फैसला, मेरे परिवार वाले स्वीकार करेंगे या नहीं? खैर, आज नहीं तो शायद भविष्य में ही सही, लेकिन यह होता ज़रुर। घर में मेरी वजह से ही अशांति का माहौल बना रहता था। ऐसा नही है कि पापा जी के दिल को दुखा कर मेरे मन को शांति मिली है। मैं भी दुखी हूं। मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करता था कि घर में सबको खुश रखूं, लेकिन मैं भी आखिर इंसान हूं। बस, अब और नहीं रह सकता था उस माहौल में। शायद आज नहीं तो कल मेरा ना होना आपके दुखों को कुछ कम कर सकेगा, पापा जी। हो सकता है आज आप मुझे खोने का दुख करो, परंतु मैं यह आत्मविश्वास के साथ कह सकता हूं कि यह दुख और पीड़ा ज्यादा समय तक आपके जीवन में नहीं रहेगी, क्योंकि मैं आपकी इकलौती संतान तो हूं नहीं। मैं यह आशा करता हूं कि आपके दो और बच्चे आपकी हर महत्वकांक्षाओं को पूरा करे। इसी सोच में डूबे हुए, मैंने अपने वॉलेट से एक तस्वीर निकाली और उसे देखने लगा। यह वही फ़ोटो थी, जो आज से तेरह साल पहले खींची गई थी। कितने अच्छे लग रहे थे हम सब। मैं, माँ, पापा जी, दादी और पिल्लू। यह हमारे सम्पूर्ण सुखी परिवार वाली तस्वीर थी। लेकिन आज तेरह साल बाद, यह तस्वीर अब पूरी तरह से बदल चुकी थी।
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