गुज़री है सारी उम्र , तिनकों को सजाने में
निश्चित नहीं ठिकाना , जहां मै ठहर जाऊं
बेरंग हुआ जीवन , सपनों को सजाने में
सपने भी सच हुए कब , जिसकी खुशी मनाऊं
बारिश में भीगना हो , या धूप की तपन
शीत की गलन में भी , यूं रहा मगन
जीवन की सांझ में जब , बैठेंगे साथ मिलकर
चिंता न होगी कल की , जी भर हसेंगे खुलकर
बड़ी भूल हुई हमसे , चिंता जो किया कल की
वर्तमान में न जीकर , अपने से मैंने छल की
नहीं पल का है ठिकाना , ये भूल गया मै तब
मदहोश जी रहा था , जवानी का जोश था जब
कौन सी खुशी मनाऊं , ज़माना तू ही बताना
बस घोंसला बचा है , और साथ में पछताना
#घोंसला