सूरज जब चलता है
तब दिन शुरू होता है
जिंदगी लेती है अंगड़ाई
काम - काज शुरू होता है
नील गगन में,
उन्मुक्त उड़ान से,
पक्षियों का कलरव होता है
नव प्रभात का सन्देशा लेकर
सूरज जब उदित होता है
ज्यों- ज्यों सूरज बढ़ता है
नयी उमंगों से
मन मुदित होता है
जीवन नव कर्म की धारा
हर मन ये ही कहता है
कर्मधारा में बहते- बहते
खुद से बातें करते- करते
सूरज संध्या से मिल जाता है
और बातों ही बातों में
दिवाकर ढल जाता है