देश काल की सीमाओं से आजाद मन,
उड़ता है दूर गगन में बादलों संग,
विचरता है फूलों की वादियों में,
कभी हिमाच्छादित चोटियों पर,
कभी घने जंगलों में पेड़ों के बीच,
बहता है झरनों, नदियों के संग,
कभी थक विश्राम करता है कंदराओं में,
सागर की फेनिल लहरों के साथ,
हिचकोले लेती कश्ती में लहराता,
सीपियों-शंखों को रेत से चुनता,
समस्त शरीरिक बंदिशों से विमुक्त,
मैं और मेरा उन्मुक्त शरारती मन।
#शरारती