यह बात कितनी अजीब लगती है, जब हम किसी व्यक्ति को बहुत चाहने लगते है, तो ना केवल वर्तमान में उनके साथ रहना चाहते है, बल्कि उसके अतीत को भी निगलना चाहते है, जब वह हमारे साथ नहीं था। हम इतने लालची और ईष्यालु हो जाते है कि हमे यह सोचना भी असहनीय लगता है कि कभी ऐसा समय रहा होगा, जब वह हमारे बगैर जीता था, प्यार करता था, सोता-जागता था। फिर अगर कुछ साल उसी एक आदमी के साथ गुजार दे तो वह कहना भी असम्भव हो जाता है, कि कौन- सी आदत। पत्तो की तरह वे इस तरह आपस में घुल-मिल जाती हैं कि आप किसी एक पत्ते को उठाकर नहीं कह सकते कि यह पत्ता आपका है और दूसरा किसी दूसरे का...।
-निर्मल वर्मा