आज की सुबह सुहानी नहीं थी
हवाओं में ठंडक नहीं थी
चिड़ियों की आवाज़ में मायूसी थी
आज मेरे शहर को हो क्या गया था
मुझे कुछ समझ ना रहा था
किससे पूछता किससे जानता
सूझ ना रहा था
सब पहले की तरह तो दिख रहा था
वो ही मुस्कान वो ही बाते थी
शायद में ही बदल गया था
में ही खुशहाली ना देख पा रहा था
मुझे तो बस छूटे रास्ते दिख रहे थे
पहचाने रास्ते अनजाने हो रहे थे
आंखो पे पुरानी यादें तर रही थी
मुझसे मेरा ही कुछ छूट रहा था
मुझसे मेरा शहर छूट रहा था