मज़दूर नहीं मजबूर
में घूम रहा हूं सड़कों पे
उम्मीदोंकी मंज़िल को,
अपने पैरोंसे काटूंगा
में कलयुगके इस साहिल को।
सुनता हूं में लोगोको
मुझे कहते है तुम जाहिल हो,
उन्हें कोन समझाए जाकर
भूखे रहकर क्या हासिल हो।
मुझे ना परवा वायरस की,
ना पैकेज और ना राशन कि,
इन सब के खातिर मेरा
सम्मान ही जब नाकाबिल हो।
मेरा दर्द और मेरी मजबूरी
लोगो के लिए बस बातें है,
कितने आकर केह पाएंगे
हम तुमको ले जाते है,
वो दिन कब फिर आएगा
जब में मुस्कुराउंगा,
अपने ही पैसोंसे अपने
बच्चों को खिलाऊंगा।
जब फिर मानवता अपने
चरम पे लापस आएगी,
मेरा रब ही जाने मेरे देश में
वो सुबह कब आएगी।