मकाँ-दर-मकाँ बनाता गया,
आदमी सिर्फ़ एक घर के लिए,
मकान तो,
निष्प्राण सा,
कुछ ,सांझ की अरुणिमा में,
यायावर,जो हमारे भीतर है,
लौटने की प्रतीक्षा में हो,
दूर किसी बियावान में,
धूपगांव की झोपड़ी जैसा,
गहरी नींद में सपने देखे,
उसके "प्रकाश" की सुगन्ध से भरा हो,
चलो,
कहीं से भी ऐसे,
घरों को बटोर लाएं,
इन्हें बो दें,
दीवालों के भीतर...!!!
करुनेश कंचन