शूरवीर या यों कहें कि वो अपने को सूरमा कहता था।सब के सुख सुख में साथ निभाने के दावे करता आये दिन दिख जाता था।झूठ थे या सच किन्तु उसकी शूरवीरता के किस्से उसके मुँह से आये दिन सुनने को मिल ही जाते थे।कहते हैं ना झूठ को भी सौ दफा बोला जाए तो वो सच ही लगने लगता है।शायद यही सब मोहल्ले वालों के साथ हुआ था।किन्तु एक दिन कुछ ऐसा घटित हुआ जिसने सबको झकझोर के रख दिया।
मुझे मत मारो,मुझे मत मारो,एक क्रन्दनयुक्त आवाज के साथ एक अधेड़ उसके घर के अंदर से बाहर धक्का से खाते हुए गिरता दिखा।फटे हाल सफेद दाढ़ी मैले कुचेले कपड़े।क्रंदन इतना करुण था कि अगले ही पल कई लोग अपने घरों से बाहर खड़े थे। उस घर के अंदर से उस शूरवीर सूरमा की उबलती आवाज़ मोहल्ले के सन्नाटे को चीर रही थी।अब तक किसी को कुछ समझ नही आ पा रहा था।लेकिन अगले ही क्षण उस अधेड़ के एक वाक्य ने घटना को आईने की तरह साफ कर दिया।
मैंने अपनी जिंदगीभर की नौकरी की कमाई और दिल्ली वाला मकान तो तुम लोगों के नाम कर दिया,अब तो मेरे पास अपने खाने के भी पैसे नहीं रहे।उसके यह कहते ही किसी को ये समझने में देर नहीं लगी कि वो अधेड़ तो उन शूरवीर सूरमा के बड़े भाई साहब थे,जिनके परिवार को नियति के क्रूर प्रहार ने उनसे पहले ही छीन लिया था।तब से वह अपने उस शूरवीर भाई के परिवार के साथ ही रहते थे।कितनी बार भूखे होने पर मोहल्ले से उनके भोजन पानी चाय की आपूर्ति की गई।पता नहीं कितने सितम उस अधेड़ ने सहे होंगें कि एक अच्छा खासा समझदार व्यक्ति अब एक अर्धविक्षिप्त अधेड़ में तब्दील हो चुका था।उस दिन तो वो शूरवीर महोदय मोहल्ले वालों के लिहाज से शांत हो गए और अपने बड़े भाई को बड़ी सख्ती के साथ घर के भीतर ले गए।किन्तु उस दिन के बाद उस अधेड़ को किसी ने कभी कहीं नही देखा।यह समझने में किसी को संदेह नहीं कि उस अधेड़ के साथ अवश्य कुछ घटित हुआ होगा।उस दिन से उस शूरवीर की शूरवीरता की सभी परते खुल चुकी थीं।अब वह अपने किस्से गाता हुआ दिखाई नहीं ही पड़ता था।कुछ दिन बाद खबर मिली कि उसके बड़े भाईसाहब नहीं रहे।
मन में एक बेचैनी और अंतर्द्वंद छिड़ गया कि ये कैसे शूरवीर और उनकी शूरवीरता है जो समाज में अपनों की रक्षा के लिए नहीं,उन्हीं को अपना बल और छल दिखाने के लिए है।नहीं चाहिए हमें ऐसे शूरवीर और उनकी शूरवीरता जो मानवता को शर्मसार कर रिश्तो को तार तार कर दे।