भूखे पेट अधफटे कपड़े यही मेरी पहचान है ।
राष्ट्र नियामक न समझो पर यही मेरी पहचान है ।
मैं ही युद्धभूमि में लड़ता खेतों में हरियाली भरता ।
ऊँचा राजमहल चौबारा मेरा स्वेद बिन्दु पी बनता ।।
मैं चुपचाप बिना कुछ पूँछे कहना इनका उनका सुनता ।
अर्थव्यवस्था की चक्की में जीवन मेरा पिसता रहता ।
पर मेरे सपनों में भी मुस्काता हिन्दुस्तान है ।।
मुझे न्याय से अन्यायों को सहना आता है ।
मुझको कलुषित होकर भी बहना आता है ।
फलाच्छादित होकर मुझको झुकना आता है ।
मेरे कानों को भी चीखे सुनना आता है ।
जीवन के संघर्षों में भी हँसना आता है ।
हम ही तो राष्ट्र हेतु पर देते निज बलिदान है ।
विश्वपटल पर निज कर्मों से मैंने नाम कमाया है ।
हितचिंतक बन विश्वोदय का हमने मान बढ़ाया है ।
जीवन के शाश्वत लक्ष्यों का सबको ज्ञान कराया है ।
प्रगति के मर्यादित पथ का हमने भान कराया है ।
आज समादृत मृत्यु करेगी मन इससे अनजान है ।।
#न्याय