#निकल पड़े हज़ारों पग,लाँघने लम्बी डगर,
पेट की आग से ,झुलस गये नगर नगर ।
गोद में अबोध शिशु,माथे पर लिए गठ्ठर,
डगमगाती चल रही,लक्ष्य का नहीं ख़बर।
संभाले ना सँभल रहा,पलायन श्रमिकों का,
उजड़ने लगी वस्तियां,सूना है शहर शहर।
हाथों को ना काम है,बहुत कठिन शाम है,
गाँवों में ही ठांव मिले,वहीं हो जीवन बसर।