सब ने खींचे पैर मेरे!
उसने खींचा हाथ !
सारे जग ने हसी उड़ाई !
सब ने की फरियाद !
उस दिन में घुटनो पे गिरा था ,
सब कुछ चकना चूर हुआ था ,
उसने ही फटी जेब सिलाई .
अंधेरो में ज्योत जलाई !
उसने मुझको गले लगाया !
हाथ पकड़कर मुझे भगाया !
बोला में हु साथ तुम्हारे ,
जवाब देना अब करारे .
में तो जैसे मरकर जिया था!
उस रात में बहोत रोया था ,
अब मेरी खुशियों से यारी ,
सब पे मेरा दोस्त हे भारी ,
अब नहीं कोई मुझे सताता ,
बिन बातोंके मुझे रुलाता ,
मेरे रथ का स्वर्णिम पहिया ,
मेरे युद्ध का वो लड़वैया ,
कैसे चुकाऊं कर्ज में तेरे ,
मेरे दोस्त ,ये फ़र्ज़ हे मेरे ,
के तुझको ना कभी गवाऊ
तेरा में सच्चा दोस्त कहलाऊ!(nidhi)