खूबसूरत
मन की आंखो से देखोगे तो
कीचड़ का खिलता कमल हुँ |
तड़कता भड़कता गीत नहीं
साधा सीधा ग़ज़ल हुँ ||
सादगी ज़ेवर मेरा, सोहलियत की तेवर रखती हुँ |||
एक मुख़्तसर सी नज़र रखती हुँ,
सबरति नहीं हुँ मैं, अपनी श्रृंगार को सरल रखती हुँ,
उसमें भी कयामत की हुनर रखती हुँ ||||
आइना हुँ मैं दिल मैं कंहाँ कोई राज़ रखती हुँ ||||
शिकवा नहीं तारीफ में मेरे गर कोई,
ना लिखे शायरी, ग़ज़ल या किताब,
मैं तो अपने आप में ही मगरूर रहती हुँ ||||||