क्या नाम दू
यह इश्क़, इस प्रित को क्या नाम दू ; कोई जरा मुझे बताये;
यही इश्क़ जो मुझे दिन रात तडपाए , बेन्तहा सताये !
नज़र मिलते ही दिल पराया हो गया, यह क्या हो गया ?
धडकता है सिने में मेरे, पर उसके लिये; मेरा ही दिल मुझे धोका दे गया ।
उड़ गई नीन्द रातों की, हाये अचानक मुझे यह क्या हो गया ;
नीन्द न आये फिर भी आँखे तरस्ती है दर्शन को; बुलाती हू सपनो मे;
अब आँखे मेरी, देखती है सपने तेरे, अरे मुझे यह क्या हो गया !
नस नस में तू ही है समाया, फिर भी, आखिर तो, तू है पराया ।
राणा यह समझे ना, मिरा क्यू भई बांवरि, यह प्रित को क्या नाम दूँ ?
पराया है तू, तो क्यू लागे अपना सा, मोहन मेरे, इस प्रित को मै क्या नाम दू?
यूह न तडपा, यूह न तरसा, राधा की, मिरा की, गोपियो की प्रित को क्या नाम दूँ ?
Armin Dutia Motashaw