माँ इस शब्द में ही अजीब सी कश्मकश है......
माँ जो बचपन में मुझे रोता देख मेरी हर बात समझ जाती में बोल भी नहीं पाती थी फिर भी न जाने कैसे मेरे शब्दों को सुन लेती,
वो माँ ही तो है जो चहेरा देख मुड़ समज जाती, आवाज सुन आंसुओं को पहेचान लेती, हर दुख हर मुश्किल का दट़ के सामना करना सिखाती, बेटी को अपनी परछाई बनाती, भूख लगने पर अपने हाथ से खाना खिलाती, ओर जब मुश्किलों से लड़कर थक जाएं तो प्यार से गले लगाकर गोद में सुलाती.
इससे बढ़कर और क्या कहुँ तेरे लिए माँ ,लिखने बैठुं तो दुनिया के सारे शब्द भी कम पड़ जायेंगें,तेरी ममता के सामने तो ये दुनिया भी कुछ नहीं मुझे तो माँ शब्द में ही दुनिया नजर आती है.