कभी-कभी कितना सूना हो जाता है मन। कुछ लिखना चाहूं भी तो जैसे कुछ बचा ही नहीं मेरे पास, सब कुछ खो गया हो। बस दो-चार शब्द यूं ताकते हैं जैसे किसी नीरव रात्रि में किसी वृक्ष के कोटर में डरे, सहमे से कुछ पंछी..जिन्हें ये आभास हो गया हो कि इस रात्रि के भाग्य में कोई सुबह नहीं.......