ये क्या हुआ कुछ पता न चला, क्यू हादशा बन गया सिलसिला.
टुकड़े में तुम थे टुकड़े में में भी, टुकड़े मिले तो हम बने.
ये दील जिदंगी से खफा हो चला था जिसे फिर जीने के बहाने तुम बने.
तन्हा सफर कि मुश्किल डगर में तुम हमसफ़र जो मिल गए ये जख्म सारे सिल गए
बिखरे पड़े थे बेजार लम्हे काटो के जेसे , हर जगह वो फूल बन के खिल गए.
सड़के पर कितनी सह्याम गुजारी, वो ही रात होते आशियाने तुम बने.
ये क्या हुआ कुछ पता न चला 😚