शुरुआत का छोर नजर आता है लेकिन अंतिम हमेशा छुट जाता है। वक्त निकलने के बाद कभी सोचा नहीं, वह क्या था पेड़ के पत्तों की तरह एक हवां में झड़ गया। वह संबध था या एक नाटक? जो शुरूआत से अंत तक गढ़ दिया गया था। उस नाटक के सभी पात्र कल्पनाओं से भविष्य की ओर जाते हुए दिखते। शहर, प्यार और सपनों के बाद दाे पात्रों का नाटक एक संबंध का शक्ल लेता है। एक वक्त बाद नाटक का शुरूआत और अंत तक की कहानी एक निबंध बना जाती है। जब भी कोई पुछता शुरूआत कैसे हुई? मुझे लगता यह त्रैमासिक परीक्षा में पूछे जाने वाला सबसे आसान सवाल है जो मुझे कंठस्थ याद हैं और एक स्वर में लोगों को नाटक का शुरूआत बता देता। फिर जब कोई पुछता, सब ठीक है ना? यह सवाल मुझे अर्धवार्षिक परीक्षा में अथवा के रूप पूछे गए उस निबंध की तरह लगता जिसमें एक सवाल शुरूआत जो याद है लेकिन दूसरा अंत का सवाल याद नहीं। अंत के पूछे जाने पर विचार करता हूॅ। आखिर अंत कहां हाेगा? मुझे ज्ञात होगा कि नही? पांच साल बाद सब ऐसा ही रहेगा जैसा आज है? कहानी जीवंत रहेगी या उसका अंत शोर से होगा? जहन से सवाल उठते ही वह कठिन बन जाता है। आज बहुत दिनों बाद किसी ने पूछा अंत कैसे हुआ? यह सवाल वार्षिक परीक्षा में अंग्रेजी भाषा में कंप्यूटर का निबंध बताने जैसे लगा जो मुझे कभी याद नहीं रहा। मुझे तो हमेशा से वंडर ऑफ साइंस याद रहा जिसे मैं कहानी का आसान सवाल शुरूआत कहता हूॅ।..