Hindi Quote in Poem by Meenakshi Singh

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ताउम्र की सजा
सब कहते हैं तुम बड़े विचित्र हो 
ना किसी से मिलना-जुलना 
ना ही किसी से कोई संबंध 
मुझे तुम्हारी यही विचित्रता भा गयी
मेरे कमरे की वो खिड़की 
जहां से खड़ी होकर मैं 
तुम्हें अक्सर निहारा करती..
याद है तुम्हें 
जब तुम्हें आभास हुआ कि 
सामने की खिड़की से 
कोई तुम्हें देखती रहती है
फिर तुमने उस खिड़की के पर्दे को 
एकदम साइड में रखना शुरू कर दिया
अब तुम्हारी नजरें भी 
आ जाती थी मेरी खिड़की पर 
और फिर मैं झेंपकर हट जाती थी
तुमसे पहला सामना हुआ 
जब मैं अपनी सहेलियों के साथ 
पास वाले पार्क में गयी थी
तुम भी वही टहल रहे थे 
तुम्हारी नज़रों ने 
मेरे चेहरे का पोस्टमार्टम कर दिया
सबकी नजरों को बचा कर 
मेरे पास से गुजरते हुए
छोटी सी चिट्ठी का गिरा जाना
घर आकर जब मैंने पढ़ा 
वह पहला प्रेम-पत्र
हमेशा के लिए हो गई तुम्हारी
कुछ महीने बाद मेरी शादी तय होना 
मैं चाहकर भी अपना मुंह न खोल सकी 
इस बीच मैंने खिड़की से झांका था कई बार 
देखा था तुम्हारी सूजी हुई आंखों को
गुनहगार थी मैं तुम्हारी
तुम्हारी दी हुई हर सजा मंजूर होती
परंतु तुम जैसा अंतर्मुखी इंसान 
अपने प्यार को सजा कैसे दे सकता था 
जब तुमने मेरी विदाई से एक दिन पहले 
उसी खिड़की से उछाला था एक फ्लाइंग किस
तभी मैंने सोच लिया था 
तुम्हारी ओर से अपने आप को 
सजा मैं खुद दूंगी 
ताउम्र तुम्हें चाहने की सजा देकर
अपने गुनाह का प्रायश्चित करूंगी
इस सजा में ताउम्र के लिए 
खुद को जकड़ लिया है मैंने..!!
मीनाक्षी सिंह 

Hindi Poem by Meenakshi Singh : 111416425
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