हम प्यार समझ बैठे थे जिसे ,क्या भूल हुई हमसे ये बड़ी
परवाह नहीं थी अपनों की ,जब साथ में मेरे थी वो खड़ी
सपनों की दुनिया के आगे, कुछ सोच सका न सूझ पड़ी
परिवार की माला तोड़ दिया ,बिखर चुकी थी कड़ी कड़ी
मोती की आभा चली गई , घर की माला में थी जो जड़ी
जोश में होश भूलकर सोचा ,दुनिया तो रहेगी साथ खड़ी
भूल गया था स्नेह पिता का ,भूला वो अनुशासन की छड़ी
ममता का समंदर भूल गया ,बंधन की लड़ाई मां ने
लड़ी
भूला छाया उस बरगद की ,जाने कौन थी वो मनहूस घड़ी
आदर हो सदा बड़ों का जहां ,जिस कुल में थी ये रीति पड़ी
ठुकरा आया सब मूल्यों को ,दिया उछाल घर की पगड़ी
बनावटी उसूलों की दुनिया में, पर्वत सी विपदा आन पड़ी
मेरे विचार हों शुद्ध हे ईश्वर ,बरसाओ कृपा ज्यों सावन की झड़ी
ये पाठ नहीं भूलूंगा कभी ,जीवन में है सबसे आन बड़ी
#बनावट