आज बहुत पछताया मन देख किताबो का जीवन सोचा कुछ न बात करूं भावों को मन मे रख्खूँ | दिन ढलते जब शाम हुई जाने क्यों इच्छा हुई मेरी ,पुस्तक पर, दो शब्द कहूँ,अब मन मे कुछ भी न रख्खूँ | कौन किताबे पड़ता है?
उनमे भी सपने गढ़ता है ? डिजिटल युग मे आये ऐसे इनको पढ़ना भाये कैसे |शब्द खो रहे ,अर्थ न मिले | भावो के चित्रण व्यक्त हो रहे , शब्दो से होता काम नही ,पुस्तक मेला बस नाम का ही|ruchi
#जन्म