''साधुओं की हत्या"
इस गांव को मृत गांव कहूँ
या फिर मुर्दा दिल इंसानों की बस्ती
साधुओं की गुरु अस्थि दर्शन की अंतिम यात्रा
रास्ते मे एक बहशी दरिंदों का गांव था
गांव की माटी को साधुओं के खून से सीचा गया
यह कोई और नही थे गांव के रहबशर थे
भीष्मपितामह की जमात पुलिस के सामने
गांव के दुःशासनों ने मिल कर
इंसानियत का चीरहरण कर डाला,
किसी आंखों में साधुओं के लिए दया नही थी
और न ही थे कोई संबेदनाओं के स्वर
भीड़ के बीच चुल्लू भर पानी रखा था वह भी
गांव की दरिंदगी को देख शर्म से सूख रहा था
और कुछ था तो वह नफरत की आग थी
अनियंत्रित भीड़ अरअराकर टूट पड़ी थी
आसमान में साधुओं के चीखने की आवाजें थीं
जान बख्स देने की लाचार साधुओं की पुकारें थी
पुलिश के निकम्मेपन की लहराती तख्तियाँ थी,
जैसे जैसे साधुओं के देह में बिभिन्न प्रकार से
बरस रहे थे हथियार छोटे बड़े आकार के
उस गांव की आत्मा जरी साधुओं की पुकार से
मानवता भी रोई होगी साधुओं की चीत्कार से
साधुओं के प्राण पखेरू उड़े गांव के सत्कार से
कैसी सभ्यता?शून्य हो रहे मानव संस्कार से
नयनों से वरस रहा रक्त इस क्रूर व्यवहार से।
किताब-"सच के छिलके" कविता संग्रह से
रचनाकार-शिव भरोस तिवारी 'हमदर्द'
सर्वाधिकार सुरक्षित